सार्थक न्यूज छत्तीसगढ़ , संवाददाता श्री गिरिज राज जुरेशिया
छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति का प्रतीक छेरछेरा पर्व एक बार फिर प्रदेशभर में श्रद्धा, उत्साह और सामाजिक समरसता के साथ मनाया गया। पौष पूर्णिमा के अवसर पर मनाया जाने वाला यह लोकपर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि दान, सहयोग और मानवता का जीवंत उदाहरण है।
छेरछेरा पर्व का सीधा संबंध कृषि संस्कृति से जुड़ा हुआ है। फसल कटाई के बाद जब घर-घर अन्न की प्रचुरता होती है, तब समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा अन्नदान कर जरूरतमंदों की सहायता की जाती है। इस दिन बच्चे, युवा और ग्रामीण टोली बनाकर गांवों में घर-घर जाकर पारंपरिक स्वर में कहते हैं—
“छेरछेरा, छेरछेरा… अन्न दान देहु, लक्ष्मी बसे रहो।”
इन पंक्तियों के साथ लोग श्रद्धा भाव से अन्नदान करते हैं।
छेरछेरा पर्व का मुख्य उद्देश्य समाज में अमीर-गरीब के भेद को मिटाना, कोई भूखा न रहे की भावना को साकार करना तथा आपसी भाईचारे को मजबूत करना है। यह पर्व सामाजिक समानता और सहयोग की भावना को बढ़ावा देता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व के माध्यम से बच्चों में संस्कार, दया, करुणा और साझा करने की सीख दी जाती है। साथ ही यह पर्व लोकगीत, लोकभाषा और पारंपरिक संस्कृति को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान भौतिकवादी युग में छेरछेरा जैसे पर्वों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि यह हमें मानवता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश देता है।
कुल मिलाकर, छेरछेरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की आत्मा, मानवीय मूल्यों का प्रतीक और सामाजिक समरसता की मजबूत कड़ी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी छत्तीसगढ़ की पहचान को सहेजते आ रही है।









